मैंने ४० से ज्यादा मर्दों से चुदवा चुकी हु
Randixxx – मैं प्रीती, एक भोलीभाली लड़की, बनारस में पली बढ़ी, शादी करके मुंबई आई, हज़्ज़रों सपने आँखों में लिए, एक सीधी साधी लड़की, जो पति को सबकुछ मानती थी, धीरे धीरे किस तरह एक पतिता बनी?
आज पति सतीश, एक मोबाईल की दूकान का मालिक, सुबह ९ बजे घर से निकल के रात को १० बजे घर वापस आना, यह आज १५ साल से रूटीन है.
आज कम से कम ३०से ४० पर पुरुषों जिसमे बूढ़े ,जवान, किशोर, पडोसी, अजनबी, वॉचमैन,दूधवाला,सब्जीवाला, डॉक्टर, साधू, पंडित, दूकान का नौकर, मजदूर, नंदोई का भाई, नंदोई, ननद के ससुर, बहन का ससुर, बेटों का क्रिकेट कोच शामिल हैं, सबके लिंग से अपनी योनि का मर्दन करवा चुकी हुँ. ऐसी तो ना थी मैं? कैसे कब क्यों हो गई? अब कोई ग्लानि या पछतावा नहीं है.
जानना चाहेंगे आप, मन हल्का करने के लिए सब बताना चाहती हूँ, दोनों बेटे भी सतीश अर्थात मेरे पति के नहीं है, सब पंडितजी और तांत्रिक बाबा की कृपा है।
लेकिन सतीश को आजतक पता नहीं चला,
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झूठ नहीं कहूँगी लेकिन असल में मेरा नाम प्रीती नहीं है, उससे मिलता जुलता है, पति का नाम भी सतीश नहीं है, लेकिन आप सब समझ सकेनेग की नाम छुपाना पड़ता अहै, हाँ सरनेम पांडे है मेरा , शादी से पहले दुबे थी।
एकदम छिनार हो गए अब मैं, शुरुआत करती हूँ.
बनारस में पली बढ़ी, पाण्डेपुर में ही हमारा दो मंज़िला मकान है, ऊपर किर्रायेदार रहते हैं परिवार के साथ ,नीचे पिताजी की दूकान और हमारे ४ कमरे, माँ, दो भाई, एक छोटी बहन, दादी और चाचा चाची उनके बच्चे पुश्तैनी मकान में रहकर गाँव की खेती बाड़ी संभालते हैं, अब गाँव का नाम पता मत पूछना , मकान भी पाण्डेपुर में नहीं है , थोड़े अगल बगल में ही है, अब एकदम पूरी पहचान नहीं बता सकती, क्या पता कोई जान पहचान वाला पढ़ ले, सतीश मतलब मेरे पतिदेव ही कभी पढ़ लें तो?
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हाँ स्कुल वहीँ है, ??? निकेतन विद्या मन्दिर. खैर , पढ़ने लिखने में सदाहरण थी, ना बहुत अच्छी ना बहुत खराब . सुंदर थी, आकर्षक , १२ क्लास तक उम्र १७ साल में आराम से पहुँच गई, दोनों भाई बड़े थे, डिग्री कॉलेज जाते थे उस वक़्त, मैं जवान हो रही थी, भगवान की दया से रंग मेरा बहुत गोरा है, कद ५ फिट २ इंच, इस समय, क्लास १२ में लगभग इससे १ इंच कम रहा होगा, दुबली पतली सी थी मै, अब तो गदरा गई हूँ, अब चलती हूँ तो कबूतरों को टाइट ब्रा में ना रखूं तो ना जाने कितने शिुकारी बाज़ झपट्टा मार लें,
मुंबई की सड़कों पर शाम को सब्जी लेने जाओ तो कम से कम ३ ४ कड़क हाथ चूतड़ ज़रूर दबा देते हैं, कम से कम एक बार और नहीं तो एक कुहनी चूची पे भी कोई ना कोई लगा ही देता है, हमारे देश में नारी की यही कहानी है, थोड़ी बड़ी हुई नहीं कि रास्ता चलना हराम, पति तो सुहागरात में क्या छुएगा उससे पहले इतनी बार सड़कों पर गलियो में चूची और चूतड़ पर कई हाथ पड़ चुके होते हैं,
मन करता है ऐसी मशीन लगा के चलें लडकियां कि कोई छुए तो तगड़ा करंट लगे और ठरकी वहीँ करंट से मर जाएं.
खैर स्कुल लड़कियों का था, जवानी तो फूटी ही थी, मन में सपने उमंगें आते ही थे, फ़िल्में, गीत सबकी चर्चा सहेलियीं से होती थीं, १९९४ की बात है, मेरा फेवरेट नया नया फिल्मों में आया अक्षय कुमार था, ऐसे ही पति के सपने देखने लगी थी मैं, जो लंबा हो, घने लम्बे बाल हों, चौडी छाती ही,
मुझे पहाड़ों में लेकर वादा रहा सनम, होंगे जुड़ा ना हम गाये, और कभी रोमांटिक सेक्स का मुद हो तो मुझे पानी की टंकी में उठा कर गिराये और गाये टिप टिप बरसा पानी ,(मेरी शकल रवीना टंडन से काफी मिलती है, ऐसा सभी कहते हैं)
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कई सहेलियों के बॉयफ्रेंड बन चुके थे, चुप चुप के चिट्ठीबाजी होती थी, मेरे भी पीछे कुछ आवारा मंडराने लगे, मन ही मन अच्छा लगता था लेकिन दिल तो मैं अक्षय कुमार को दे चुकी थी, ये पता था अक्षय कुमार मेरे नसीब में नहीं है लेकिन कम से कम उसका कोई डुप्लीकेट तो मिले.
रही सही कसर सहेलियों ने रवीना कहकर निकाल दी थी और मेरा दिमाग सातवें आसमान पे था, लगता था बनारस के ये पान गुटका चबाने वाले और दुपहिए पे घूमने वाले ओल्ड फैशन के कपडे पहन कर मन्द्रणाने वाले मेरे दिल में नहीं बस सकते,
एक बार हमारे किरायेदार के बेटे जो कि सेकंड ईयर डिग्री में था जिसका नाम अमित पाठक था, उसने बड़ी हिमंत से मुझे रास्ते में रोका और कहा प्रीति मैं तुम्हे बहुत चाहता हूँ ,बचपन से ही तुमसे प्यार करता हूँ, तुम कहो तो तुम्हारे लिए दुनिया छोड़ दूँ, मुझे बड़ी घबराहट हुई ,
लेकिन मैंने हिम्मत बाँध कर कहा कि ज्यादा बकैती करोगे तो दुनिया नहीं मकान ज़रूर छुड़वा देंगे, वह डर कर चला गया, उसके एबाद कई दिनों तक मेरे सामने आता तो नज़रें नीची कर लेता, ये मुझपर ज़िंदगी में किसिस ने पहला प्रोपज था.
हाँ जी, आ गई अपना अपडेट लेकर. अमित ने मुझे प्रोपज किया लेकिन मैंने भाव नहीं दिया, बेचारा बहुत घबरा गया, कई दिन तक उसे देखके लगता था कि डर के मारे आत्महत्या ना कर ले. मेरी सबसे पक्की सहेलियां थीं साबिहा और गीता।
सबीहा के पिताजी खाड़ी के देश में काम ,करते थे , उसके ३ बहनें और एक छोटा भाई था. वो घर में सबसे बड़ी थी। गीता के पिताजी की लेडिज कपड़ों की दूकान थी जिसमें औरतों लड़कियों के सलवार सूट के कपडे, ब्रा पेंटी, इत्यादि बिकते थे. उसके भी एक छोटा भाई था कुणाल ,जो सबीहा के भाई हसन के साथ कक्षा ४ में पढता था.
हम तीनों सहेलियों की आपस में बहुत बनती थी, कभी से कुछ नहीं छिपाती थीं हम तीनों.
सबीहा अपने सगे चाचा जो कि लगभग २५ साल का था, फंसी थी, और बाद में पता चला कि उसका चाचा सुहेल उसकी माँ को भी छानता था.
गीता हमारे ही कन्या विद्यालय में साइंस पढ़ाने वाले नवजवान मास्टर, विजय त्तिवारी उम्र तक्सीबन २५ साल , जो २ साल पहले ज्वाइन हुआ था उससे फंसी थी और कई बार मैं और सबीहा कमरे के बाहर पहरा देते थे स्कुल में जिसके फलस्वरूप परीक्षा में हमें कभी कोई तकलीफ नहीं हुई. वैसे और भी बहुत सी सहेलियां थीं जिनाक ज़िक्र समय आने पे करूंगी.
हाँ तो ये दोनों मुझे खूब उकसाती थीं कि तू भी किसी की होजा रवीना, अक्षय जब आएगा तब आयेगा. लेकिन मैं अपने पथ से डगमगाती नहीं थी। ऐसा नहीं था कि मेरी इच्छा नहीं होती थी खासकर के जब विजय सर गीता को मस्तराम की किताबें देतें पढ़ने के लिए और गीता हमें देतीँ.
घर में अपने कमरे में रात को छुप कर चुदाई पेलाई लंड बुर ये सब पढ़ कर दिमाग भन्ना जाता लेकिन किसी तरह मन पे काबू कर लेते। सबीहा अक्सर कर्मचन्द नामक अश्लील साप्ताहिक पत्रिका लाती जो उसे उसका चाचा देता, उसमें सचित्र कहानियां होती थीं चुदाई की, मुझे मन ही मन पता था कि सबीहा का चचा मेरी सील तोड़ना ,चाहता था, लेकिन मैं काफी चालाक थी और सब अक्षय कुमार जी की कृपा थी।
और मैंने स्टारडस्ट नामक मेग्जीन में रवीना का इंटरव्यू पढ़ा था जिसमें उसने कहा था कि मेरा कौमार्य मेरे पति को मेरी ओर से भेंट होगा और मैं चूँकि रवीना को आदर्श मानती थी और उस वक़्त ये हवा थी कि वो अक्षय से शादी करेगी तो मैं भी मन ही मन में संकल्प ले चुकी थी कि मेरी बुर का उद्घाटन भी मेरा पति जो अक्षय कुमार जैसा दीखता होगा वही करेगा.
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बनारस में जाड़ा बहुत गज़ब का पड़ता है, गर्मी में तो पसीना से आदमी नहा जाता है. जाड़े का टाइम था , दिसम्बर का महीना , १० दिसम्बर १९९४, मैं रज़ाई में शाम को जाके घुस गई, बड़ी ठण्ड लग रही थी, तभी बहार दूकान के यहां कुछ आवाज़ें आने लगि.
सुनने की कोशिश की तो पता चला की मौसी मौसा और उनकी बेटी संध्या आई है, लखनऊ से. मैं रज़ाई से कूद पड़ी, संध्या मेरी हमउम्र थी पढ़ाई छोड़ चुकी थी, ईसि साल उसकी शादी हुई थी, गौना बाकी था.
मैं राजइ से कूद कर बाहर की ओर भागी, सामने मौसी दिखीं घर में गलियारे में , मैंने लपक कर उनके पाँव छू लिए, वो मुझे उठा कर गले से लगा ली और मेरे गाल चुम के अपनी उँगलियों को बाँध के मेरी ठुड्डी पर रख कर बोली ” ई प्रीति त सयान होत जात है,
अबके जीजा से कहवाके संध्या के गवने में इनहु क बियाह हो जाय ” मैं शर्मा कर बोली ” धत्त मौसी, आप बड़ी गन्दी हैं. ” वो हंसने लगी और आगे की ओर चल दी , पीछे संध्या दीदी थि.
संध्या दीदी की उम्र इस वक़्त २० साल की थी, गोरा रंग, चमकदार चेहरा, जैसे खून गाल से चु पड़े कभी भी, मैंने झुक कर उनके पाँव छ्ये , उन्होंने भी उठाकर मुझे गले लगा लिया, और चुम लिया गालों को, मौसा मौसी की ईकलौती संतान थी , बड़े लाड प्यार से पाली थी, मौसा जी लखनऊ में बिजली विभाग में इंस्पेक्टर थे,
मैंने पूछा मौसा जी कहाँ हैं, वो बोली बाहर बरामदे में ही बैठे हैं मौसी मौसा के साथ. मैं बोली पाँव छु आउ, बहार गई तो तख़्त पर मौसा जी माताजी भाई बैठे थे, मौसा जी से मैं ज्यादा बात नहीं करती थी, उन्होंने हाल चाल पूछा, मैंने भी बता अंदर आ गई.
संध्या दीदी का हाथ पकड़ कर खिंच कर अपने कमरे की तरफ ले गई , तबतक आवाज़ आई ” अरे पिरीती , मौसाजी के तनो चाह तो पीया दे ” मौसाजी की आवाज़ आई ” नहीं दीदी , अब सिदे खाना खाएंगे” मैं सुनकर संध्या दीदी को अपने कमरे में ले गई, इस बीच मौसी जी बाथरूम में चली गई थीं.
मैं संध्या दीदी को पलंग पर धक्का दिया और कहा” दीदी, जीजा की कोई चिठ्ठी आती है या नहीं छुप के?” ओ बोली धत्त।
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